
संसद में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर हुई ऐतिहासिक 10 घंटे लंबी बहस ने देशभर में नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दिया। यह बहस सिर्फ एक गीत पर नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिकता, सांस्कृतिक महत्व और राजनीतिक प्रतीकवाद को लेकर हुई। सत्ता और विपक्ष—दोनों पक्षों के नेताओं ने अपने-अपने तर्कों के साथ सदन में जोरदार तरीके से अपनी बात रखी।
PM मोदी का वक्तव्य: राष्ट्रभावना सर्वोपरि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि आज़ादी की लड़ाई की आत्मा है। उन्होंने याद दिलाया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इसी गीत ने लाखों युवाओं में जोश भरा था। पीएम मोदी ने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि कई लोग राष्ट्रवाद से डरते हैं, जबकि वंदे मातरम् किसी धर्म या जाति का नहीं, बल्कि भारत माता का सम्मान है।
पीएम ने कहा कि इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं, भारतीय अस्मिता के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रियंका गांधी का संबोधन: मुद्दों से भटकाने की कोशिश
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि यह बहस असली मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् हमारी धरोहर है और कांग्रेस ने हमेशा स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका का सम्मान किया है। प्रियंका ने जोड़ा कि इसे लेकर विवाद पैदा करना गलत है, क्योंकि देश के असली मुद्दे—महंगाई, नौकरियां और किसानों की समस्याएं—पर बात होनी चाहिए।

अखिलेश यादव का रुख: सांप्रदायिकता से दूर रखें
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है, लेकिन इसे किसी समुदाय के खिलाफ इस्तेमाल न किया जाए। उन्होंने कहा कि राजनीति में ऐसे मुद्दों को हथियार बनाने से समाज में अनावश्यक दूरी बढ़ती है। अखिलेश ने यह भी कहा कि देश को जोड़ने वाली भाषा और गीतों का इस्तेमाल विभाजन पैदा करने के लिए नहीं होना चाहिए।
अन्य प्रमुख नेताओं की प्रतिक्रियाएँ
संसद में कई वरिष्ठ नेताओं ने भी अपनी राय रखी।
- कुछ नेताओं ने कहा कि वंदे मातरम् और जन गण मन दोनों को बराबर सम्मान मिलना चाहिए।
- कई नेताओं ने सुझाव दिया कि स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में इन गीतों के महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए।
- कुछ विपक्षी नेताओं ने कहा कि राष्ट्रगीत को विवाद में घसीटने की परंपरा लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
बहस की खास बातें
10 घंटे चली इस चर्चा में इतिहास, धर्मनिरपेक्षता, सांस्कृतिक विरासत और आज़ादी की लड़ाई से जुड़े कई पहलुओं का जिक्र हुआ। सरकारी पक्ष ने कहा कि आज के युवाओं में राष्ट्रभावना को मजबूत करने के लिए ऐसे प्रतीकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। वहीं विपक्ष ने जोर देकर कहा कि देशभक्ति को मजबूरी या राजनीतिक हथकंडे के रूप में नहीं थोपना चाहिए।
निष्कर्ष
वंदे मातरम् पर संसद की 10 घंटे की यह बहस दिखाती है कि भारत में राष्ट्रवाद का विषय कितना भावनात्मक और संवेदनशील है। यह स्पष्ट है कि चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—वंदे मातरम् को देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सभी मानते हैं। मतभेद इस बात पर हैं कि इसका उपयोग कैसे और किस संदर्भ में किया जाए।
