
बिहार की सियासत में एक बार फिर असदुद्दीन ओवैसी ने बड़ा सवाल खड़ा किया है। एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख ओवैसी ने हाल ही में दिए बयान में कहा कि अगर राज्य में मात्र 3 प्रतिशत वोट शेयर वाली पार्टी का नेता उपमुख्यमंत्री बन सकता है, तो 17 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाला समुदाय मुख्यमंत्री क्यों नहीं दे सकता? यह बयान बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ गया है। ओवैसी का यह बयान न सिर्फ राजनीतिक बल्कि सामाजिक समीकरणों को भी चुनौती देता है।
उन्होंने कहा कि बिहार में हर बार मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के वोट तो लिए जाते हैं, लेकिन सत्ता की असली भागीदारी कभी नहीं दी जाती। “हमारे वोटों से सरकारें बनती हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी हमेशा उन्हीं के पास जाती है जिनके पास जनसंख्या और वोट दोनों कम हैं,” ओवैसी ने कहा।
राज्य की वर्तमान राजनीति में ओवैसी का यह बयान विपक्षी गठबंधनों और एनडीए, दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। जहां एक ओर ओवैसी मुस्लिम मतदाताओं को सीधे संबोधित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या बिहार की राजनीति में मुस्लिम समाज केवल वोट बैंक बनकर रह गया है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी का यह बयान 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की कोशिश है। बिहार में मुस्लिम आबादी लगभग 17 प्रतिशत है, लेकिन अब तक कोई भी मुस्लिम मुख्यमंत्री नहीं बना। ऐसे में ओवैसी का तर्क राजनीतिक रूप से भले विवादित हो, पर सामाजिक दृष्टि से सोचने पर मजबूर करता है।
ओवैसी ने अपने भाषण में यह भी कहा कि “जब तक सियासत में बराबरी की हिस्सेदारी नहीं मिलेगी, तब तक इंसाफ अधूरा रहेगा।” उनके इस बयान ने बिहार की राजनीति में प्रतिनिधित्व के सवाल को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। ओवैसी का यह सवाल सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक सामाजिक यथार्थ की झलक है. जहां लोकतंत्र में संख्या तो है, मगर सत्ता में सहभागिता की कमी बनी हुई है। अब देखना यह है कि बिहार की राजनीतिक पार्टियां इस चुनौतीपूर्ण सवाल का जवाब कैसे देती हैं।
