
वाराणसी में बैकुंठ चतुर्दशी के पावन अवसर पर काशी विश्वनाथ धाम एक बार फिर भक्तिभाव और आस्था के रंग में रंग गया। मंगलवार की सुबह से ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं। पूरे परिसर में “हर-हर महादेव” के जयघोष से वातावरण शिवमय हो उठा।
इस शुभ अवसर पर श्री बैकुंठेश्वर महादेव विग्रह का विधि-विधानपूर्वक रुद्राभिषेक किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार और घंटा-घड़ियाल की ध्वनि के बीच पंडितों ने दूध, दही, घी, शहद, और गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक संपन्न कराया। भक्तों ने पुष्प, बेलपत्र, धतूरा और भस्म अर्पित कर अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
बैकुंठ चतुर्दशी का यह दिन भगवान श्रीहरि विष्णु और भगवान शिव के मिलन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने स्वयं काशी आकर बाबा विश्वनाथ की आराधना की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें बैकुंठ लोक का द्वार प्राप्त हुआ। इसी स्मरण में हर वर्ष काशी में बैकुंठेश्वर महादेव का विशेष पूजन और रुद्राभिषेक किया जाता है।
धाम परिसर में दीपों से सजी आरती देखने के लिए हजारों श्रद्धालु एकत्र हुए। गंगा तट से लेकर मंदिर परिसर तक भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। महिलाओं ने घरों और गलियों में दीप प्रज्ज्वलित कर बैकुंठ चतुर्दशी की मंगल कामनाएं कीं।

काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन की ओर से सुरक्षा और व्यवस्था के कड़े इंतजाम किए गए थे। श्रद्धालुओं को कतारबद्ध दर्शन कराया गया। स्थानीय पुजारियों और सेवायतों ने बताया कि इस वर्ष रुद्राभिषेक में काशी के अलावा देश के विभिन्न भागों—दिल्ली, मध्यप्रदेश, गुजरात, और महाराष्ट्र से भी श्रद्धालु पहुंचे थे।
रात में होने वाली शिव-विष्णु मिलन आरती के साथ पूरे धाम में दिव्यता का अनोखा संगम देखने को मिला। काशी की गलियों से लेकर विश्वनाथ धाम तक हर कोई इस पवित्र उत्सव में डूबा नज़र आया।
बैकुंठ चतुर्दशी पर संपन्न यह रुद्राभिषेक न केवल धार्मिक परंपरा का प्रतीक है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि भक्ति में एकता है, शिव में विष्णु और विष्णु में शिव का निवास है।
