
भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में जब महिलाएँ फिल्मों में काम करना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जाता था, तब एक 16 साल की लड़की ने सभी परंपराओं को तोड़ते हुए ऐसा कदम उठाया जिसने पूरी इंडस्ट्री का इतिहास ही बदल दिया। यह कहानी है जहांआरा कज्जन (Kajjan) की—जो तवायफ़ों की परंपरागत दुनिया से निकलकर मुंबई की नई उभरती फ़िल्म इंडस्ट्री की पहली सुपरस्टारों में शामिल हुईं।
कज्जन का जन्म ऐसे माहौल में हुआ जहाँ संगीत, नृत्य और अदाकारी जीवन का हिस्सा थे। ‘कोठों’ की उस दुनिया में कला तो थी, मगर सम्मान नहीं। लेकिन कज्जन बचपन से ही असाधारण प्रतिभाशाली थीं। उनकी आवाज़, अदायगी और मंच पर उपस्थिति उन्हें बाकी लड़कियों से अलग बनाती थी। मात्र 16 साल की उम्र में उन्होंने मंचीय प्रदर्शन और नाटक मंडलियों में काम शुरू किया और वहीं से फिल्मकारों की नज़र उन पर पड़ी।
साल 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा आई। इसी वर्ष दूसरी बोलती फिल्म “शिरीन-फ़रहाद” रिलीज़ हुई, जिसमें कज्जन ने मुख्य भूमिका निभाई। फिल्म ने उन्हें रातों-रात पूरे देश में मशहूर कर दिया। दर्शक उनकी मधुर आवाज़ और अभिनय से इतने प्रभावित हुए कि अखबारों ने उन्हें उस समय की “सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री” और शुरुआती “बॉलीवुड सुपरस्टार” कहना शुरू कर दिया।

उस दौर में महिलाओं का फिल्मों में आना बेहद कठिन माना जाता था, लेकिन कज्जन ने अपनी मेहनत और कला से यह साबित किया कि प्रतिभा किसी भी पृष्ठभूमि की मोहताज नहीं होती। कोठे की पारंपरिक दुनिया से निकलकर उन्होंने न सिर्फ अपना करियर बनाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं के लिए रास्ता भी आसान किया। उनका सफर प्रेरणादायी इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने तमाम सामाजिक बाधाओं के बावजूद अपनी पहचान खुद बनाई।
कज्जन की लोकप्रियता इतनी थी कि उनकी फिल्मों के गाने, संवाद और अंदाज़ पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाते थे। उनकी कम उम्र में मिली सफलता ने उन्हें भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में एक विशेष स्थान दिया।
आज भी कज्जन का जीवन इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, एक दृढ़ निश्चय वाला इंसान अपने हुनर के दम पर इतिहास रच सकता है।
