सतर्क रहें, सुरक्षित रहें सत्य और निष्पक्षता के साथ, BeAlertMedia आपको रखे हर पल अपडेट।

खराब AQI से फेफड़े खराब होने का रिस्क नहीं, बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच सरकार का अजीबोगरीब तर्क

भारत में वायु प्रदूषण आज एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पटना समेत कई बड़े शहर लगातार खराब एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) की चपेट में हैं। डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के अनुसार AQI का स्तर बढ़ने से सांस की बीमारियां, अस्थमा, हृदय रोग और स्ट्रोक जैसे खतरे बढ़ जाते हैं। लेकिन हाल के दिनों में सरकार की ओर से एक बयान सामने आया, जिसमें दावा किया गया कि “खराब AQI से फेफड़ों के खराब होने का रिस्क नहीं बढ़ता।” यह तर्क न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि वायु प्रदूषण से जुड़ी वास्तविक समस्याओं को कमतर आंकने जैसा भी महसूस होता है।

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही साफ कर चुका है कि खराब वायु गुणवत्ता हर साल लाखों लोगों की अकाल मृत्यु का कारण बनती है। भारत में भी पिछले वर्षों में कई शोध सामने आए हैं जिनके अनुसार लगातार धुंध और जहरीली हवा हमारे फेफड़ों की सेहत पर बेहद बुरा असर डालती है। खासकर बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं तो इस समस्या से और अधिक प्रभावित होते हैं। ऐसे में सरकार का यह कहना कि खराब AQI सीधे फेफड़ों के बिगड़ने का कारण नहीं बनता, लोगों के बीच असमंजस और अविश्वास पैदा करता है।

सरकार का तर्क यह है कि AQI सिर्फ हवा में मौजूद कणों और गैसों की मात्रा को दिखाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इससे फेफड़ों पर तुरंत या स्थायी असर होता है। उनका दावा है कि फेफड़ों का खराब होना एक लंबी प्रक्रिया है और इसमें कई अन्य कारक भी जुड़े होते हैं। हालांकि यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है कि किसी बीमारी के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे कण सीधे फेफड़ों में प्रवेश कर उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि AQI जितना खराब होगा, उतना ही गंभीर खतरा पैदा होगा। सांस फूलना, खांसी, आंखों में जलन, सीने में दर्द और थकान जैसी समस्याएं तुरंत दिखाई देती हैं। कई लोग सर्दी और धुंध के मौसम में अस्पतालों में भर्ती होने को मजबूर भी होते हैं। ऐसे में AQI का बढ़ना फेफड़ों पर प्रभाव नहीं डालता कहना वास्तविकता से दूर लगता है।

दरअसल, समस्या सिर्फ बयान तक सीमित नहीं है। असली चिंता यह है कि ऐसे तर्क लोगों को लापरवाही के लिए प्रेरित कर सकते हैं। जब सरकार ही यह कहे कि AQI से नुकसान नहीं होता, तो आम नागरिक मास्क पहनने, घर में एयर प्यूरीफायर लगाने या प्रदूषण से बचाव के प्रयास करने में ढिलाई दिखा सकते हैं। इससे हालात और बदतर हो सकते हैं।

जरूरत इस बात की है कि प्रदूषण को स्वीकार किया जाए, कारणों की पहचान हो और समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। भारत की आबादी, उद्योग, वाहन, निर्माण कार्य और जलने वाले ईंधन प्रदूषण को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इन पर नियंत्रण के बिना हवा साफ होना संभव नहीं।

सरकार को चाहिए कि वायु प्रदूषण को लेकर पारदर्शी और वैज्ञानिक जानकारी दे, न कि ऐसे बयान जो जनस्वास्थ्य के लिए भ्रम पैदा करें। हवा जहरीली हो रही है, लोग बीमार हो रहे हैं — यह सच है। और सच को नकारने से नहीं, स्वीकार करने से समाधान मिलता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top