
रिपोर्ट : विजय तिवारी भरूच
आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों के संरक्षण का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नारायण विद्यालय ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि शिक्षा केवल पुस्तकों और अंकों तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कार, चरित्र और जीवन-दृष्टि के निर्माण की सशक्त प्रक्रिया है। विद्यालय के वार्षिक सांस्कृतिक आयोजन के अंतर्गत 27 दिसंबर 2025 को प्रस्तुत श्रीरामचरितमानस का संक्षिप्त लेकिन अत्यंत प्रभावशाली मंचन उपस्थित अतिथियों, अभिभावकों और समाजजनों के लिए एक भावनात्मक एवं आध्यात्मिक अनुभूति बन गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि परम पूज्य त्रिलोचना देवी साध्वी जी एवं श्री संतोषकुमार त्रिपाठी जी की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया। दोनों अतिथियों का विद्यालय के चेयरमैन श्री हेमंतभाई प्रजापति द्वारा पारंपरिक सम्मान एवं आत्मीय स्वागत किया गया। अपने उद्बोधन में अतिथियों ने विद्यालय के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि आज के समय में ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों की अत्यंत आवश्यकता है, जो बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़े रखें।
शिक्षा के क्षेत्र में गौरव की पहचान
विद्यालय के डायरेक्टर श्री भगुभाई प्रजापति को शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उत्कृष्ट, नवाचारी और मूल्यनिष्ठ कार्यों के लिए देश-विदेश में अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। यह उपलब्धि केवल विद्यालय ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र और समाज के लिए गौरव का विषय है। उनके दूरदर्शी नेतृत्व में विद्यालय गुणवत्ता, अनुशासन और संस्कारों की त्रिवेणी को निरंतर सुदृढ़ कर रहा है।
सामूहिक प्रयास से सजी सांस्कृतिक साधना
विद्यालय के चेयरमैन श्री हेमंतभाई प्रजापति, प्रधान अध्यापिका श्रीमती विद्या राणा, अरविंदभाई, भगुभाई सहित समस्त शिक्षक-शिक्षिकाओं और विद्यार्थियों के सामूहिक प्रयास से यह मंचन केवल एक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि संस्कृति की सजीव साधना बन गया।एलकेजी से लेकर 11वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों की सशक्त अभिनय-शैली, भावपूर्ण संवाद और अनुशासित प्रस्तुति देखकर दर्शकों को ऐसा अनुभव हुआ मानो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपने परिवार सहित साक्षात् मंच पर अवतरित हो गए हों।

आधुनिकता नहीं, संस्कारों की प्राथमिकता
आज जब अनेक विद्यालय वार्षिकोत्सव के नाम पर फिल्मी गीतों और डीजे संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं, वहीं नारायण विद्यालय ने 27 वर्षों से अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए केवल सनातन संस्कृति को ही मंच प्रदान किया है। विद्यालय प्रबंधन का स्पष्ट मत है कि आधुनिक शिक्षा समय की आवश्यकता है, परंतु सनातन धर्म का ज्ञान जीवन को सही दिशा देने वाला स्थायी आधार है—और यही संतुलन सशक्त, संस्कारी और जिम्मेदार नागरिक गढ़ता है।
श्रीराम से जीवन-पाठ
श्रीराम के जीवन से मर्यादा, आदर, क्षमा, राजधर्म, सत्य, करुणा, ज्ञान, मित्रता, आज्ञापालन, वचन-पालन और देशप्रेम जैसे अनमोल आदर्श मिलते हैं। बाल्यावस्था में इन मूल्यों का संस्कार-रोपण ही स्वस्थ, समरस और सशक्त समाज की नींव रखता है। माता-पिता के साथ-साथ गुरुओं का यह नैतिक दायित्व है कि वे आने वाली पीढ़ी को धर्म और सनातन की सच्ची शिक्षा प्रदान करें—और नारायण विद्यालय के शिक्षक इस दायित्व का निर्वहन पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ कर रहे हैं।1999 से संस्कार-यात्रानारायण विद्यालय की स्थापना 14 फरवरी 1999 को हुई थी। इसका प्रबंधन नारायण नेत्र ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। विद्यालय का उद्देश्य विद्यार्थियों को ऐसा सशक्त और सकारात्मक वातावरण उपलब्ध कराना है, जहां वे सटीकता, आत्मविश्वास, अनुशासन और नैतिकता के साथ अपनी क्षमताओं को पहचान सकें और अपनी आकांक्षाओं को साकार कर सकें।देश के लिए प्रेरणास्रोततीव्र प्रतिस्पर्धा के इस युग में बच्चों के भीतर सनातन संस्कृति का बीजारोपण कर नारायण विद्यालय वास्तव में सही दशा और सही दिशा प्रदान कर रहा है। यदि देश के अन्य विद्यालय भी इस मॉडल का अनुसरण करें, तो समाज और राष्ट्र दोनों को एक सुदृढ़ नैतिक और सांस्कृतिक आधार प्राप्त हो सकता है।

कार्यक्रम के समापन पर विद्यालय के संचालक मंडल, प्रधानाचार्या, समस्त शिक्षक-शिक्षिकाओं तथा प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के प्रयासों का हृदय से अभिनंदन किया गया। उपस्थित समाजजनों ने एक स्वर में कहा कि नारायण विद्यालय का यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा।