
रामचरितमानस के सुंदरकांड में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित एक दोहा इन दिनों विद्वानों और पाठकों के बीच गहन चर्चा का विषय बना हुआ है। जब हनुमान जी लंका में आग लगाते हैं, उस प्रसंग में तुलसीदास जी लिखते हैं— “हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास”। इस पंक्ति में आए “उनचास मरुत” शब्द ने पाठकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर ये 49 मरुत कौन हैं।
एक पाठक द्वारा सुंदरकांड के गहन अध्ययन के दौरान यह विषय सामने आया, जिसके बाद वेद-पुराणों में वर्णित वायु तत्व पर शोध किया गया। अध्ययन में सामने आया कि सनातन धर्म में वायु को केवल एक तत्व नहीं, बल्कि अलग-अलग लोकों और मंडलों में कार्यरत एक जटिल शक्ति के रूप में देखा गया है। वेदों में वायु की सात प्रमुख शाखाओं का वर्णन मिलता है—प्रवह, आवह, उद्वह, संवह, विवह, परिवह और परावह। इन सातों वायुओं का संबंध पृथ्वी, सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, ग्रह, सप्तर्षि मंडल और ध्रुव जैसे विभिन्न मंडलों से बताया गया है। हर वायु का अपना अलग गुण और कार्य है—कहीं बादलों को संचालित करने वाली शक्ति है तो कहीं आकाशीय पिंडों की गति को नियंत्रित करने वाली ऊर्जा।

ग्रंथों के अनुसार, इन सातों वायुओं के सात-सात गण माने गए हैं, जो ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष और भूलोक की चारों दिशाओं में विचरण करते हैं। इस प्रकार 7 गुणा 7 करके कुल 49 मरुत माने जाते हैं, जिन्हें देवस्वरूप शक्तियाँ कहा गया है। धार्मिक विद्वानों का मानना है कि तुलसीदास जी का यह उल्लेख केवल काव्य नहीं, बल्कि वैदिक विज्ञान और ब्रह्मांडीय ज्ञान की ओर संकेत करता है। यह प्रसंग बताता है कि रामायण जैसे ग्रंथों में छिपा ज्ञान आज भी शोध और चिंतन का विषय है। सुंदरकांड का यह दोहा सनातन परंपरा की गहराई और बौद्धिक समृद्धि को एक बार फिर उजागर करता है।