ब्यूरो रिपोर्ट : सिटीजन बी अलर्ट

नई दिल्ली। अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) की हालिया रिपोर्ट, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है, पर देश के 275 पूर्व न्यायाधीशों, सिविल सेवकों और सशस्त्र बलों के पूर्व अधिकारियों ने कड़ी आपत्ति जताई है।
इन सभी ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि इस रिपोर्ट का उद्देश्य भारत की जनता के बीच RSS की छवि को धूमिल करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि USCIRF लगातार भारतीय संस्थानों और सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों को बिना ठोस साक्ष्य के नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता रहा है।
रिपोर्ट को बताया पूर्वाग्रह से प्रेरित
पूर्व अधिकारियों ने रिपोर्ट को “पूर्वाग्रह से ग्रसित” बताते हुए कहा कि यह गलत धारणाओं और बौद्धिक दिवालियापन को दर्शाती है। उन्होंने अमेरिकी सरकार से मांग की कि इस तरह की पक्षपातपूर्ण और अस्थिर रिपोर्ट तैयार करने वालों की पृष्ठभूमि की गहन जांच कराई जाए।
प्रतिबंध की सिफारिश पर आपत्ति
बयान में कहा गया कि RSS से जुड़े लोगों की संपत्तियां फ्रीज करने, उनकी आवाजाही सीमित करने और प्रतिबंध लगाने जैसी सिफारिशें पूरी तरह से एकतरफा और पूर्वाग्रहपूर्ण हैं।
अमेरिकी करदाताओं के पैसे के दुरुपयोग का आरोप
पूर्व अधिकारियों ने यह भी कहा कि USCIRF के आयुक्तों की नियुक्ति अमेरिकी सरकार करती है और उन्हें अमेरिकी करदाताओं के पैसे से फंडिंग मिलती है। ऐसे में यह रिपोर्ट इस बात का उदाहरण है कि किस तरह इन संसाधनों का उपयोग भारत विरोधी एजेंडा आगे बढ़ाने में किया जा रहा है।
RSS के योगदान का किया जिक्र
बयान में यह भी कहा गया कि RSS सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है। हालांकि, किसी भी संगठन की आलोचना हो सकती है, लेकिन वह तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां मजबूत न्यायिक व्यवस्था और संस्थागत निगरानी तंत्र मौजूद है, जिससे धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है।
बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में 25 सेवानिवृत्त न्यायाधीश, 119 पूर्व नौकरशाह और 131 सशस्त्र बलों के पूर्व अधिकारी शामिल हैं।