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बेलडांगा में ‘बाबरी-स्टाइल’ मस्जिद निर्माण विवाद ने बढ़ाया राजनीतिक तापमान

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले के बेलडांगा क्षेत्र में प्रस्तावित “बाबरी-स्टाइल” मस्जिद निर्माण की घोषणा ने राज्य की राजनीति में तूफ़ान खड़ा कर दिया है। इस मुद्दे ने न सिर्फ स्थानीय माहौल को अशांत किया है, बल्कि राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विपक्षी दल भाजपा के बीच तीखी सियासी भिड़ंत भी शुरू करा दी है।

सबसे बड़ा राजनीतिक झटका तब लगा जब टीएमसी ने विवादास्पद बयान को लेकर अपने ही विधायक हुमायूं कबीर को पार्टी से तत्काल प्रभाव से बाहर कर दिया। पार्टी नेतृत्व ने कहा कि हुमायूं कबीर के बयान ने “अनावश्यक विवाद” पैदा कर दिया है, जिससे शांतिपूर्ण माहौल और साम्प्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुँचा है। टीएमसी की ओर से स्पष्ट किया गया कि ऐसी राजनीति पार्टी की विचारधारा के अनुरूप नहीं है, इसलिए कठोर कदम उठाना ज़रूरी था।

दूसरी ओर, भाजपा ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लेते हुए टीएमसी पर तीखा हमला बोला है। भाजपा नेता दिलीप घोष ने पूरे विवाद को “मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने की कवायद” बताया। घोष ने कहा कि टीएमसी अपने राजनीतिक फायदे के लिए धार्मिक भावनाओं से खेल रही है, और इसी कारण राज्य में लगातार साम्प्रदायिक तनाव बढ़ रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राज्य सरकार ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर नियंत्रण खो चुकी है, या फिर जानबूझकर माहौल को गर्म होने दिया जा रहा है।

विवाद सामने आने के बाद स्थानीय प्रशासन तुरंत हरकत में आया और इलाके में भारी पुलिस बल, RAF तथा केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की अतिरिक्त कंपनियाँ तैनात की गईं। वरिष्ठ अधिकारियों ने बेलडांगा पहुँचकर हालात का जायजा लिया और किसी भी अफवाह या उकसावे को रोकने के निर्देश दिए। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि अभी तक मस्जिद निर्माण को लेकर कोई आधिकारिक अनुमति नहीं दी गई है, और पूर्ण जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।

इलाके में तनाव की स्थिति बनी हुई है। कुछ स्थानों पर छोटे समूहों के बीच बहसबाजी और नारेबाज़ी की घटनाएँ भी दर्ज की गई हैं, जिन्हें पुलिस ने तुरंत नियंत्रित किया। प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने, सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों से दूर रहने और किसी भी संवेदनशील सामग्री को साझा न करने की अपील की है।

इस घटना ने राज्य में चल रहे राजनीतिक समीकरणों को और अधिक जटिल कर दिया है। टीएमसी की सख़्त कार्रवाई से संदेश देने की कोशिश की गई है कि पार्टी किसी भी धार्मिक या साम्प्रदायिक विवाद को बढ़ावा नहीं देना चाहती, वहीं भाजपा इस मुद्दे को चुनावी मैदान में बड़ा हथियार बनाने में लगी है। दोनों दलों के नेता लगातार बेलडांगा की घटनाओं पर बयानबाज़ी कर रहे हैं, जिससे सियासी तापमान और बढ़ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बंगाल में पहले से ही ध्रुवीकरण की राजनीति तेज़ है, और ऐसे विवाद इससे और गहरा असर डाल सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इस मुद्दे को कितना आगे ले जाते हैं और प्रशासन किस तरह स्थिति को सामान्य बनाए रखता है।

फिलहाल, बेलडांगा तनाव, अफवाहों और राजनीतिक गरमाहट का केंद्र बना हुआ है, जहाँ शांतिपूर्ण समाधान की सबसे अधिक आवश्यकता है।

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