
बिहार की राजनीति में एक बार फिर सियासी तापमान तेजी से बढ़ने लगा है। विधानसभा चुनावों से पहले जेडीयू और एलजेपी के बीच की खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। सूत्रों के मुताबिक, 9 सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों में गहरा मतभेद है, और यही विवाद अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। वहीं, चिराग पासवान इस पूरे घटनाक्रम में वह चाल चल रहे हैं, जिससे नीतीश का “गेम” बिगड़ सकता है।
जानकारी के अनुसार, NDA गठबंधन में सीटों के फॉर्मूले पर बातचीत के दौरान एलजेपी (रामविलास) ने 9 सीटों पर अपना दावा ठोका है। इन सीटों पर जेडीयू भी अपनी मजबूत दावेदारी बता रही है। चिराग पासवान का कहना है कि 2020 के विधानसभा चुनावों में एलजेपी को नुकसान झेलना पड़ा था क्योंकि कई सीटों पर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। इस बार वे किसी भी कीमत पर अपने क्षेत्रीय प्रभाव वाले इलाकों में समझौता करने को तैयार नहीं हैं।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि चिराग की रणनीति दोहरी है — एक ओर वे खुद को NDA का “मजबूत साथी” बताना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन भी बचाए रखना चाहते हैं। उनके करीबी मानते हैं कि अगर जेडीयू और भाजपा उनके दावों को नजरअंदाज करती है, तो वे कुछ सीटों पर अलग उम्मीदवार खड़ा करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि चिराग पासवान अब नीतीश कुमार के लिए पहले से ज्यादा चुनौती बन चुके हैं। एलजेपी (रामविलास) का युवा वोटरों पर प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, और चिराग की साफ-सुथरी छवि ने उन्हें “युवाओं के नेता” के रूप में पहचान दी है। वहीं, जेडीयू खेमे को डर है कि अगर एलजेपी ने बगावती तेवर अपनाए, तो इसका सीधा फायदा राजद को मिल सकता है।
नीतीश कुमार इस पूरे विवाद को शांतिपूर्वक सुलझाने की कोशिश में जुटे हैं। खबरें हैं कि जल्द ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की मध्यस्थता से सीटों के बंटवारे पर कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा। हालांकि, अंदरखाने की खबर यह है कि चिराग फिलहाल झुकने के मूड में नहीं हैं।
बिहार की राजनीति में यह टकराव किसी बड़े सियासी उलटफेर की ओर इशारा कर रहा है। नीतीश और चिराग के बीच यह सीटों की जंग, आने वाले चुनावों की तस्वीर बदल सकती है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह टकराव समझौते में बदलेगा या फिर बिहार की सियासत में एक नया समीकरण उभरकर सामने आएगा। by shruti kumari
