
ईरान के खिलाफ जारी युद्ध ने अमेरिका और उसके पारंपरिक यूरोपीय सहयोगियों के रिश्तों में नई दरार पैदा कर दी है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू की गई सैन्य कार्रवाई में कई यूरोपीय देशों ने सीधे तौर पर शामिल होने से दूरी बना ली है। इससे नाटो (NATO) के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं और ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन की मजबूती पर सवाल उठने लगे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका चाहता था कि उसके यूरोपीय सहयोगी ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान में खुलकर साथ दें और फारस की खाड़ी में अहम समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा के लिए युद्धपोत भेजें। लेकिन कई देशों ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचने का फैसला किया। ब्रिटेन ने भी युद्धपोत भेजने के बजाय केवल तकनीकी और सीमित सहायता देने की बात कही है।
यूरोपीय देशों का मानना है कि इस युद्ध के और ज्यादा बढ़ने से मध्य-पूर्व में अस्थिरता बढ़ सकती है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। इसी वजह से कई देश सैन्य कार्रवाई की बजाय कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहे हैं। यूरोप के कई नेता यह भी मानते हैं कि अमेरिका ने इस अभियान की शुरुआत से पहले सहयोगियों से पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया, जिससे नाराजगी बढ़ी है। कुछ देशों ने तो खुले तौर पर युद्ध का विरोध भी किया है। उदाहरण के लिए स्पेन ने अमेरिकी हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताते हुए अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने साफ कहा कि यह युद्ध क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

इस बीच ट्रंप ने सहयोगियों पर नाराजगी जताते हुए चेतावनी दी कि यदि नाटो देश मदद नहीं करते हैं तो गठबंधन का भविष्य “बहुत खराब” हो सकता है। उनका कहना है कि खाड़ी क्षेत्र से तेल लेने वाले देशों को समुद्री मार्ग की सुरक्षा में योगदान देना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान युद्ध ने नाटो और पश्चिमी गठबंधन के भीतर मौजूद मतभेदों को उजागर कर दिया है। जहां अमेरिका और इजरायल सैन्य दबाव बढ़ाने की रणनीति पर चल रहे हैं, वहीं यूरोप के कई देश तनाव कम करने और बातचीत के रास्ते तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में यह युद्ध न केवल मध्य-पूर्व बल्कि पश्चिमी देशों की एकता के लिए भी बड़ी परीक्षा बन गया है।