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बिहार के चुनाव परिणाम ने साफ कर दिया कि जनता का मूड महागठबंधन के खिलाफ पहले ही बन चुका था। तेजस्वी यादव की मेहनत और कांग्रेस के जोरदार दावों के बावजूद गठबंधन जनता की नब्ज़ को ठीक से पढ़ नहीं पाया। चुनावी रणनीति में कई ऐसी गलतियां हो गईं, जिन्होंने जीत को हार में बदल दिया। आइए समझते हैं वे चार बड़ी चूकें, जिनसे महागठबंधन का पूरा समीकरण बिगड़ गया।
1. नेतृत्व में एकरूपता नहीं, संदेश बिखरा रहा
महागठबंधन की कैंपेन में सबसे बड़ा सवाल था—मुख्यमंत्री कौन?
तेजस्वी यादव ने पूरी ताकत लगाई, लेकिन कांग्रेस का रुख ढुलमुल रहा।
गठबंधन का अंदरूनी तालमेल भी पिछड़ता दिखा, जिससे मतदाता को एक मजबूत नेतृत्व का भरोसा नहीं मिला।
दूसरी तरफ NDA ने एक ही चेहरा, एक ही संदेश और एकजुट रणनीति पेश की—यही उनकी सबसे बड़ी बढ़त बनी।
2. जमीनी मुद्दों को समझने में देरी
महागठबंधन ने बेरोजगारी पर फोकस किया, लेकिन
- योजनाओं का प्रभाव
- महिलाओं में बनी सुरक्षा की भावना
- लाभार्थियों में सरकार के प्रति भरोसा
जैसे ग्राउंड फैक्ट्स को कम आंका।
बिहार में सरकारी योजनाओं का बड़ा इम्पैक्ट दिख रहा था, लेकिन विपक्ष उनकी काट नहीं निकाल पाया।
3. कार्यकर्ताओं की नाराज़गी और टिकट वितरण में गड़बड़ी
कई सीटों पर टिकट ऐसे चेहरों को दे दिए गए जो स्थानीय स्तर पर कमजोर या विवादों से घिरे थे।
कई अनुभवी नेताओं को नजरअंदाज कर दिया गया, जिससे कोर वोटर और कार्यकर्ता दोनों निराश हुए।
इसके उलट, NDA ने हर सीट पर बारीकी से सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर उम्मीदवार उतारे और डैमेज कंट्रोल भी समय पर किया।
4. रणनीति सोशल मीडिया तक सीमित, बूथ मैनेजमेंट कमजोर
महागठबंधन का प्रचार सोशल मीडिया पर तेज़ दिखा, लेकिन यह प्रभाव गांव और पंचायतों में उतना नहीं उतरा।
NDA की बूथ लेवल टीम, पन्ना प्रमुख मॉडल और लाभार्थी कनेक्ट ने आखिरी समय तक मतदाता को जोड़े रखा।
महागठबंधन बूथ मैनेजमेंट को उतनी प्राथमिकता नहीं दे पाया, जिससे कई सीटों पर करीबी मुकाबला हार में बदल गया।
