
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते दक्षिण एशिया की राजनीति में सबसे उतार-चढ़ाव भरे संबंधों में गिने जाते हैं। 1971 में जन्म के समय जो रिश्ता दोस्ती, सहयोग और बलिदान की नींव पर खड़ा हुआ, वही 54 साल बाद कई बार अविश्वास, टकराव और राजनीतिक मतभेदों का शिकार होता दिखा। आइए समझते हैं भारत-बांग्लादेश संबंधों की पूरी कहानी।
1971: दोस्ती की मजबूत शुरुआत
1971 में पाकिस्तान से आजादी की लड़ाई में भारत ने बांग्लादेश का खुलकर साथ दिया। लाखों शरणार्थियों को शरण दी गई और भारतीय सेना के हस्तक्षेप से बांग्लादेश का जन्म हुआ। शेख मुजीबुर रहमान और भारत के बीच बेहद करीबी रिश्ते बने। इस दौर में भारत को बांग्लादेश का सबसे भरोसेमंद मित्र माना गया।

1975–1990: रिश्तों में दरार
1975 में शेख मुजीब की हत्या के बाद बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। सैन्य शासन और पाकिस्तान समर्थक ताकतें मजबूत हुईं। इस दौर में भारत-विरोधी रुख बढ़ा और रिश्तों में ठंडापन आ गया। सीमा विवाद, अवैध घुसपैठ और आतंकवाद जैसे मुद्दे उभरने लगे।
1996–2001: रिश्तों में सुधार
शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद रिश्तों में फिर से गर्माहट आई। गंगा जल समझौता हुआ, व्यापार और कनेक्टिविटी पर बातचीत आगे बढ़ी। भारत को उम्मीद जगी कि दोनों देश रणनीतिक साझेदार बन सकते हैं।
2001–2008: फिर बढ़ा तनाव
बीएनपी सरकार के कार्यकाल में भारत-विरोधी गतिविधियां बढ़ीं। भारत ने बांग्लादेश पर उत्तर-पूर्वी उग्रवादियों को पनाह देने के आरोप लगाए। रिश्तों में फिर से अविश्वास हावी हो गया।
2009–2023: स्वर्णिम दौर
शेख हसीना की वापसी के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों को सबसे मजबूत दौर मिला। सीमा समझौता, बिजली-ऊर्जा सहयोग, व्यापार, रेल-सड़क कनेक्टिविटी और सुरक्षा सहयोग में ऐतिहासिक प्रगति हुई। बांग्लादेश ने भारत-विरोधी आतंकियों पर सख्त कार्रवाई की, जिससे रिश्ते नई ऊंचाई पर पहुंचे।
2024–अब तक: बदलते सुर
हाल के वर्षों में बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति, चीन का बढ़ता प्रभाव, नागरिकता कानून और कुछ कूटनीतिक बयानों ने रिश्तों में नई चुनौतियां खड़ी की हैं। भारत में इसे लेकर चिंता बढ़ी है कि कहीं बांग्लादेश फिर से भारत-विरोधी खेमे की ओर न झुक जाए।
निष्कर्ष
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते इतिहास, भूगोल और संस्कृति से जुड़े हैं, लेकिन राजनीति ने इन्हें कई बार दोस्ती से दुश्मनी की कगार तक पहुंचाया। 54 साल की यह कहानी बताती है कि दोनों देशों के संबंध स्थायी नहीं, बल्कि नेतृत्व और नीतियों पर निर्भर रहे हैं। आने वाला समय तय करेगा कि यह रिश्ता फिर से भरोसे की राह पर लौटेगा या टकराव की दिशा में बढ़ेगा।
