
भारत में करवा चौथ सिर्फ एक व्रत नहीं, बल्कि प्यार, आस्था और समर्पण का प्रतीक है। सुहागिनें इस दिन अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर करवा चौथ पर पति का चेहरा छलनी से ही क्यों देखा जाता है? इसके पीछे सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक मान्यता भी छिपी हुई है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, छलनी से चाँद देखने और फिर पति का चेहरा निहारने की परंपरा सबसे पहले वीरवती नाम की एक स्त्री से जुड़ी है। कहा जाता है कि वीरवती अपने सात भाइयों की लाड़ली बहन थी। करवा चौथ के दिन जब वह भूख-प्यास से बेहाल हुई, तो भाइयों ने छल से दीपक को छलनी में रखकर चाँद दिखा दिया। उसने व्रत तोड़ दिया और उसी समय उसके पति की तबीयत बिगड़ गई। तब देवी पार्वती ने प्रकट होकर कहा कि उसने व्रत अधूरा तोड़ा है, इसलिए दंड मिला। इसके बाद वीरवती ने पूरे विधि-विधान से व्रत किया और अपने पति को नया जीवन मिला। तभी से छलनी का प्रयोग करवा चौथ की पूजा का हिस्सा बन गया।
छलनी का प्रतीकात्मक अर्थ भी बेहद खास है। यह सत्य और भ्रम के बीच की सीमा को दर्शाती है। जब स्त्री छलनी से चाँद को देखती है, तो वह यह संकल्प लेती है कि वह हर भ्रम को दूर कर अपने रिश्ते की सच्चाई को अपनाएगी। इसके बाद पति का चेहरा देखना इस विश्वास का प्रतीक है कि वह अपने जीवनसाथी के साथ हर परिस्थिति में अडिग रहेगी।
वहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह परंपरा भीतरी संतुलन का प्रतीक है। कई विद्वान मानते हैं कि व्रत के दौरान छलनी से चाँद को देखने से आँखों पर सीधा चाँदनी का प्रभाव नहीं पड़ता, जिससे मन शांत और एकाग्र रहता है।
करवा चौथ 2025 में यह पर्व विशेष रूप से 17 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले ‘सरगी’ खाकर दिनभर व्रत रखती हैं और शाम को चाँद के दर्शन के बाद पति के हाथ से जल ग्रहण करके व्रत तोड़ती हैं।
इस तरह करवा चौथ की छलनी न केवल पूजा की एक वस्तु है, बल्कि विश्वास, प्रेम और अटूट बंधन का प्रतीक बन चुकी है। हर साल यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सच्चे रिश्ते सिर्फ व्रत और परंपरा से नहीं, बल्कि भावना और समर्पण से जीवित रहते हैं। by shtuti kumari
