
रिपोर्ट : विजय तिवारीवडोदरा।
हिंदीभाषी महासंघ वडोदरा के तत्वावधान में आयोजित महा रामलीला ने सात दिनों तक नगर को राममय बनाए रखा। यह आयोजन केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि रामायण के शाश्वत मूल्यों—धर्म, मर्यादा, त्याग, करुणा, नीति और भक्ति—का जीवंत लोकप्रवाह बना। सधी हुई मंच-सज्जा, प्रकाश-प्रबंधन, पार्श्व-संगीत और शास्त्रसम्मत संवादों ने हर प्रसंग को भावनात्मक गहराई और वैचारिक संतुलन के साथ प्रस्तुत किया।
पहला दिन : अधर्म का उदय और अवतार की घोषणानारद मोह से विष्णु आकाशवाणी तकरामलीला का शुभारंभ नारद मोह से हुआ, जिसने माया, अहंकार और आत्मबोध का संदेश दिया। इसके बाद रावण के अत्याचार और मेघनाद (इंद्रजीत) की इंद्र पर विजय से अधर्म की भयावहता उभरी। संकटग्रस्त देवगण महादेव की शरण में पहुंचे। महादेव के मार्गदर्शन और देवताओं के ध्यान के पश्चात विष्णु आकाशवाणी हुई—राम अवतार की घोषणा के साथ धर्म स्थापना की भूमिका सुदृढ़ हुई।
दूसरा दिन : अवतरण और धर्म-यात्रा का आरंभराम जन्म से पुष्प वाटिका तकदूसरे दिन राम जन्म और सीता जन्म के दिव्य दृश्य मंचित हुए। विश्वामित्र आगमन, ताड़का वध और अहिल्या उद्धार ने करुणा, शौर्य और धर्मबोध को रेखांकित किया। पुष्प वाटिका में राम–सीता का प्रथम मिलन सौम्यता और मर्यादा के भाव के साथ प्रस्तुत हुआ।
तीसरा दिन : मर्यादा और संस्कारों का उत्सवसीता स्वयंवर से विवाह सम्पन्नसीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग ने धर्मबल की विजय दिखाई। लक्ष्मण–परशुराम संवाद में तेज और विवेक का संतुलन उभरा। अयोध्या से बारात, परछन, कन्यादान और वैदिक विधि से चारों भ्राताओं के विवाह सम्पन्न हुए—उल्लास और संस्कारों का भव्य संगम।

चौथा दिन : त्याग की परीक्षाकैकेई–मंथरा से राम वनगमन तककैकेई–मंथरा संवाद, कोपभवन और कैकेई–दशरथ संवाद ने कथा की दिशा बदली। राम–दशरथ संवाद में आज्ञापालन को सौभाग्य मानने की मर्यादा, राम–कौशल्या में मातृ-आश्वासन, राम–लक्ष्मण में भ्रातृ-प्रेम, सुमित्रा–लक्ष्मण में वीरता का आशीर्वाद और राम–सीता में सहधर्मिणी का अटूट साथ—इन सबका समापन राम वनगमन के करुण दृश्य से हुआ।
पाँचवाँ दिन : भक्ति और नीति का आलोकराम–केवट, भरत मिलाप और अधर्म का प्रतिरोधराम–केवट प्रसंग में निष्काम भक्ति और चातुर्य, भरत–मिलाप में वचनबद्धता और त्याग का शिखर दिखा। सुपर्णखा प्रसंग ने मर्यादा-संरक्षण का संदेश दिया। छाया-सीता (अग्नि संरक्षण) की नीति-कथा और खर–दूषण वध से अधर्म के अंत की शुरुआत हुई।
छठा दिन : खोज, नीति और पराक्रमसीता हरण से लंका दहन तकसीता हरण में करुणा और अधर्म का टकराव, जटायु बलिदान में धर्मरक्षा, शबरी–राम मिलन में निष्काम भक्ति, राम–सुग्रीव मित्रता, बाली वध में राजधर्म का कठिन निर्णय और सुग्रीव राज्याभिषेक के बाद सीता-खोज—कथा ने गति पकड़ी। रावण–अंगद संवाद नीति बनाम अहंकार का शिखर बना। हनुमान की लंका यात्रा, अशोक वाटिका में सीता दर्शन, चूड़ामणि का संदेश और अंततः लंका दहन—अधर्म के वैभव का प्रतीकात्मक पतन।

सातवां दिन (समापन) : विजय और रामराज्यलंका विजय से अयोध्या राज्याभिषेक तकहनुमान का लौटना और युद्ध-आदेश, राम सेतु निर्माण (राम नाम शिलाओं की विजय), विभीषण शरणागति—करुणा और नीति का संतुलन। लंका युद्ध में लक्ष्मण मूर्छा और संजीवनी, मकरध्वज–हनुमान संवाद (कर्तव्य का आदर्श), अहिरावण वध (पंचमुखी रूप—साहस और बुद्धि), कुंभकर्ण वध, मेघनाद वध (रणनीति और धैर्य) और अंततः रावण वध—अहंकार का पूर्ण अंत।इसके पश्चात सीता अग्नि परीक्षा से लोकमर्यादा की पुष्टि, पुष्पक विमान से अयोध्या गमन, भरत–राम मिलाप और श्रीराम राज्याभिषेक—यहीं से रामराज्य का आरंभ, जहां न्याय, करुणा और धर्म सर्वोपरि हैं।
सात दिनों का यह विराट मंचन स्थापित करता है कि भक्ति (हनुमान), नीति (राम), त्याग (भरत) और मर्यादा (सीता)—यही रामकथा का शाश्वत सार है।“धर्म के मार्ग पर चलकर ही लोक और परलोक दोनों का कल्याण होता है।”महा रामलीला ने वडोदरा की सांस्कृतिक चेतना में भक्ति, विवेक और नैतिक मूल्यों की अमिट छाप छोड़ दी।