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महापर्व छठ: मिट्टी, माँ और आस्था से जुड़ने का अद्भुत संगम

“केलवा के पात पर उगे लन सुरुजमल झांके झुकेके करेलू छठ बरतिया से झांके झुके…”
शारदा सिन्हा की यह अमर पंक्तियाँ कानों में गूंजते ही हर उस व्यक्ति के दिल को छू जाती हैं, जिसकी रूह अपने गांव और मिट्टी से जुड़ी है। यह सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि उन भावनाओं की प्रतिध्वनि है जो हर वर्ष छठ पर्व के साथ जीवंत हो उठती हैं।

छठ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति से गहराई से जुड़ा वह अध्याय है, जिसकी स्मृति पूरे वर्ष बनी रहती है। यही वह समय होता है जब बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बंगाल से लेकर विदेशों में रह रहे लोग अपने घर लौटने की बेचैनी महसूस करते हैं। ऑफिसों और कामकाज के बीच भी बस एक ही इच्छा होती है — “इस बार छठ घर पर ही मनाना है।

कई बार छुट्टियाँ न मिलने पर लोग रातभर सफर करते हैं, लंबी यात्राएँ करते हैं, ट्रेन या बसों में ठसाठस भीड़ के बीच भी सिर्फ एक ख्याल मन में रहता है “शाम के अर्घ्य से पहले घर पहुँच जाना है।” यही भावना छठ को सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का सबसे पवित्र अवसर बनाती है।

नहाय-खाय से शुरू होता है महापर्व छठ

छठ की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन महिलाएँ पवित्र नदियों या तालाबों में स्नान कर शुद्धता का संकल्प लेती हैं। इसके बाद मिट्टी के चूल्हे पर अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी से प्रसाद तैयार किया जाता है, जिसे “कद्दू-भात” भी कहा जाता है।

दूसरे दिन खरना मनाया जाता है। इस दिन व्रती दिनभर निर्जला उपवास रखती हैं और शाम को सूर्यास्त के बाद खीर, पूरी और केले के प्रसाद से पूजा कर व्रत तोड़ती हैं। यह दिन आत्मशुद्धि और संयम का प्रतीक माना जाता है।

संध्या अर्घ्य छठ का सबसे भव्य क्षण

तीसरे दिन का संध्या अर्घ्य छठ पर्व का सबसे भावनात्मक और अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है। सूर्यास्त के समय पूरा परिवार घाटों पर पहुँचता है, हाथों में सूप, टोकरी, फल, ठेकुआ और दीप लेकर। ढलते हुए सूरज को अर्घ्य अर्पित करते हुए जब घाटों पर गीत गूंजते हैं “उग हो सुरुज देव तो पूरा वातावरण भक्ति और लोक संस्कृति से भर उठता है।

उषा अर्घ्य और पारण पूर्णता का क्षण

चौथे दिन प्रातःकाल उषा अर्घ्य के साथ व्रत का समापन होता है। व्रती महिलाएँ उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर अपने परिवार की खुशहाली, संतान की लंबी उम्र और समाज के कल्याण की कामना करती हैं। इसके बाद पारण कर व्रत पूर्ण होता है।

छठ एक आस्था, एक अपनापन

छठ पूजा केवल सूर्य उपासना नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि, त्याग और अपनी जड़ों से जुड़ाव का पर्व है। यह वही डोर है जो हर परदेस में बसे बिहारी को अपने गांव-घर की ओर खींच लाती है। जब ट्रेन या बस बिहार की सीमा में प्रवेश करती है, तो दिल में एक अद्भुत सुकून और गर्व उमड़ पड़ता है।

सच कहा जाए तो, छठ सिर्फ पूजा नहीं “घर लौटने का कारण” है।
यह पर्व सिखाता है कि चाहे हम कितनी भी दूर चले जाएँ, हमारी आत्मा हमेशा अपनी मिट्टी, अपने सूरज और अपनी माँ की ममता से जुड़ी रहती है। by shruti kumari

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