
मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और ऊर्जा संकट के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति एक संतुलित और अहम भूमिका निभाती नजर आ रही है। इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा असर डाला है, ऐसे में भारत ने शांति और संवाद का रास्ता अपनाने पर जोर दिया है। फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू किए, जिसके बाद हालात तेजी से बिगड़ते गए। इसके जवाब में ईरान ने न सिर्फ इजरायल बल्कि खाड़ी देशों और ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया। इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर वैश्विक तेल और गैस सप्लाई पर पड़ा है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण मार्ग पर भी खतरा बढ़ गया है, जहां से दुनिया की लगभग 20% तेल सप्लाई गुजरती है।
इसी बीच हाल ही में इजरायल द्वारा ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमले और ईरान की जवाबी कार्रवाई ने ऊर्जा संकट को और गहरा कर दिया है। कई खाड़ी देशों के तेल और गैस संयंत्र भी निशाने पर आए, जिससे वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सक्रिय कूटनीति अपनाई है। उन्होंने कई देशों के नेताओं से बातचीत कर तनाव कम करने और शांति स्थापित करने की अपील की है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ भी उनकी बातचीत में यही संदेश सामने आया कि इस संकट का समाधान केवल संवाद और कूटनीति से ही संभव है।

भारत की चिंता सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। मिडिल ईस्ट से भारत की ऊर्जा निर्भरता काफी अधिक है, ऐसे में इस संघर्ष का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर पड़ सकता है। बढ़ती तेल कीमतें महंगाई को बढ़ा सकती हैं और सप्लाई चेन भी प्रभावित हो सकती है। इस पूरे संकट में भारत एक संतुलित भूमिका निभा रहा है—एक तरफ वह अमेरिका और इजरायल के साथ संबंध बनाए रखता है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ भी संवाद जारी रखता है। यही “संतुलन की कूटनीति” भारत को वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार और प्रभावशाली देश के रूप में स्थापित कर रही है। कुल मिलाकर, मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक संकट बन चुका है, और ऐसे समय में भारत की शांतिपूर्ण और संतुलित रणनीति बेहद अहम मानी जा रही है।