
भारत में लंबे समय से अटके हुए लेबर लॉ में बदलाव लागू हो गए हैं, जिससे गिग-इकोनॉमी प्लेटफॉर्म्स पर खर्च बढ़ने की संभावना है। यह बदलाव स्विगी, जोमैटो, ओला, उबर जैसी कंपनियों को सीधे प्रभावित करेगा और इससे उपभोक्ताओं की जेब पर भी असर पड़ सकता है। वहीं, फॉर्मल स्टाफिंग कंपनियों के लिए नए नियम फायदे का सौदा साबित हो सकते हैं।
लेबर कोड के लागू होने के बाद गिग-वर्कर्स को अब सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलेगा। इसके तहत प्लेटफॉर्म कंपनियों को गिग वर्कर्स के लिए सरकार की ओर से चलाए जाने वाले सोशल-सिक्योरिटी फंड में योगदान देना होगा। रिपोर्ट्स के अनुसार, सालाना टर्नओवर का 1-2% या गिग वर्कर्स को दिए गए कुल भुगतान का 5% तक का योगदान कंपनियों को देना पड़ सकता है। अगर अधिकतम 5% की सीमा लागू होती है, तो इससे फूड डिलीवरी ऑर्डर पर लगभग 3.2 रुपये और क्विक-कॉमर्स ऑर्डर पर 2.4 रुपये का अतिरिक्त खर्च आएगा।
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट बताती है कि इस अतिरिक्त खर्च के कारण प्लेटफॉर्म्स अपनी फीस बढ़ा सकते हैं या नए तरह के सर्ज-लिंक्ड चार्जेज (मांग बढ़ने पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्क) लागू कर सकते हैं। यानी उपभोक्ताओं को यह बोझ सीधे भुगतना पड़ सकता है।
हालांकि, अगर सरकार इन सुविधाओं को एक केंद्रीय फंड के जरिए संचालित करने की मांग करती है, तो प्रति ऑर्डर वास्तविक अतिरिक्त लागत घटकर केवल 1-2 रुपये रह सकती है। इससे प्लेटफॉर्म्स के लिए बोझ थोड़ा कम होगा और उपभोक्ताओं पर असर भी सीमित रहेगा।

इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा गिग वर्कर्स को होगा। अब उन्हें स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, मातृत्व लाभ और वेतन न मिलने की स्थिति में कवर जैसी सुविधाएं मिलने की संभावना है। इससे गिग-इकोनॉमी में काम करने वालों की सुरक्षा बढ़ेगी और उन्हें लंबे समय तक काम करने में स्थिरता भी मिलेगी।
दूसरी ओर, फॉर्मल स्टाफिंग कंपनियों के लिए यह बदलाव फायदे का सौदा साबित हो सकता है। नियमों के स्पष्ट और केंद्रीकृत होने से औपचारिक स्टाफिंग सेक्टर की संभावनाएं बेहतर होंगी और कंपनियों के लिए काम करना आसान हो जाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारतीय गिग-इकोनॉमी को और अधिक पेशेवर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि इससे प्लेटफॉर्म्स के खर्च में वृद्धि होगी, लेकिन इसका दीर्घकालिक असर गिग वर्कर्स की सुरक्षा और फॉर्मल स्टाफिंग सेक्टर के विकास पर सकारात्मक होगा।
अंततः यह बदलाव उपभोक्ताओं के लिए मामूली बढ़े हुए खर्च के रूप में नजर आएगा, लेकिन गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा का वास्तविक लाभ मिलेगा। यह नीति भारतीय अर्थव्यवस्था में गिग-इकोनॉमी को अधिक स्थिर और संरचित बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
