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जय शाह के हस्तक्षेप के बाद प्रतीका रावल को मिला मेडल, सेमीफाइनल से पहले हो गई थीं चोटिल

भारतीय खेल जगत में अक्सर प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की कहानियां प्रेरणा देती हैं, लेकिन कभी-कभी उन कहानियों के पीछे संघर्ष और दर्द भी छिपा होता है। ऐसी ही एक कहानी गुजरात की युवा खिलाड़ी प्रतीका रावल की है, जिनका नाम हाल ही में जय शाह के हस्तक्षेप के बाद चर्चा में आया।

दरअसल, प्रतीका रावल राष्ट्रीय स्तर की एक एथलेटिक्स खिलाड़ी हैं, जो हाल ही में आयोजित राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन कर रही थीं। उन्होंने क्वार्टर फाइनल में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए सेमीफाइनल में जगह बनाई थी। लेकिन सेमीफाइनल से ठीक पहले अभ्यास के दौरान उन्हें गंभीर चोट लग गई उनके पैर की मांसपेशी खिंच गई, जिससे डॉक्टरों ने उन्हें मैदान पर उतरने से मना कर दिया।

हालांकि, प्रतीका का प्रदर्शन अब तक इतना उत्कृष्ट था कि वे मेडल की रेस में प्रमुख दावेदार मानी जा रही थीं। मगर चोट के चलते जब उन्हें प्रतियोगिता से बाहर होना पड़ा, तो उनके नाम पर पदक रोक दिया गया। इससे न केवल प्रतीका बल्कि उनके कोच और समर्थक भी बेहद निराश थे।

मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जहां कई खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों ने न्याय की मांग की। तभी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के सचिव और खेल प्रशासन में सक्रिय जय शाह ने इस मामले पर ध्यान दिया। उन्होंने तुरंत खेल मंत्रालय और आयोजन समिति से संपर्क कर पूरी रिपोर्ट मांगी।

रिपोर्ट में साफ़ हुआ कि प्रतीका ने क्वार्टर फाइनल तक के अपने प्रदर्शन के दम पर पॉइंट टेबल में शीर्ष तीन में जगह बनाई थी, और चोट के कारण उन्हें मैच से हटना पड़ा था। नियमों के अनुसार, अगर कोई खिलाड़ी चोट के कारण बाहर होता है और उससे पहले के राउंड में उसका प्रदर्शन शीर्ष स्तर का रहा है, तो उसे “सम्मानजनक पदक” (Honorary Medal) दिया जा सकता है।

जय शाह ने इस नियम के आधार पर व्यक्तिगत रूप से दखल दिया और कहा कि “प्रतीका जैसी खिलाड़ी देश की शान हैं। चोट किसी की मेहनत को मिटा नहीं सकती। उनका संघर्ष ही असली जीत है।”

आखिरकार, समिति ने निर्णय लिया कि प्रतीका रावल को ब्रॉन्ज मेडल (कांस्य पदक) दिया जाएगा। जब यह खबर प्रतीका तक पहुंची, तो उनकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा “मैंने सोचा था कि मेरी मेहनत बेकार चली गई, लेकिन आज लगा कि देश अपने खिलाड़ियों के साथ खड़ा है। जय शाह सर का शुक्रिया, जिन्होंने हमें विश्वास दिलाया कि न्याय अब भी जिंदा है।”

प्रतीका की इस कहानी ने देशभर के युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया है कि चोट या हालात चाहे जैसे भी हों, सच्ची मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। जय शाह के इस कदम की देशभर में सराहना की जा रही है — यह सिर्फ एक मेडल नहीं, बल्कि उस भावना की जीत है जो हर खिलाड़ी के दिल में बसती है।

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