
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक स्तर पर नई चिंता पैदा कर दी है। 13 अप्रैल 2026 को अमेरिका ने ईरान के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए उसके बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी (ब्लॉकेड) लागू कर दी, जिससे खाड़ी क्षेत्र में हालात और गंभीर हो गए हैं। यह कार्रवाई उस समय हुई जब दोनों देशों के बीच शांति वार्ता विफल हो गई। यह नाकेबंदी खासतौर पर ईरान के बंदरगाहों तक आने-जाने वाले जहाजों को रोकने के लिए की गई है। हालांकि, अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि जो जहाज ईरान से संबंधित नहीं हैं, उन्हें होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी जाएगी। फिर भी इस फैसले का असर पूरे वैश्विक तेल व्यापार पर पड़ना तय माना जा रहा है, क्योंकि यह इलाका दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है।
इससे पहले ईरान ने भी होरमुज जलडमरूमध्य पर कड़ा नियंत्रण कर रखा था और कई जहाजों की आवाजाही सीमित कर दी थी। यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा संभालता है, ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा सीधे दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। अमेरिका की इस कार्रवाई का सबसे बड़ा असर तेल बाजार पर देखने को मिला है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और यह 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो वैश्विक महंगाई बढ़ सकती है और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।

नाकेबंदी के चलते ईरान के तेल निर्यात पर भी बड़ा असर पड़ा है। अनुमान है कि करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन ईरानी तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है, जिससे बाजार में आपूर्ति कम हो जाएगी और कीमतें और बढ़ सकती हैं। वहीं ईरान ने इस कदम को “समुद्री डकैती” बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। इससे खाड़ी क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ने का खतरा और गहरा गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह टकराव केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। खासकर भारत, चीन और यूरोप जैसे तेल आयात करने वाले देशों को इसका सीधा झटका लग सकता है।