
अमेरिका और इज़राइल के मिलकर ईरान पर व्यापक हमला के बाद दुनिया भर में तनाव बढ़ गया है। इस हमले में ईरान की सरकार और सेना के कई ठिकानों को निशाना बनाया गया और ईरानी नेतृत्व पर गंभीर हमले किए गए। इस ताज़ा संघर्ष की वजह से मध्य पूर्व में अस्थिरता और तेल की सप्लाई पर चिंता बढ़ी है। दुनिया के कई देशों ने इस हिंसा पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, लेकिन चीन का रुख बाकी बड़े देशों जैसा रू-बरू नजर नहीं आया। चीन ने इस हमले के खिलाफ औपचारिक रूप से विरोध जताया है और कहा है कि युद्ध से तनाव और बढ़ सकता है तथा सबको बातचीत से समाधान निकालना चाहिए। उसने यह भी कहा कि किसी देश की संप्रभुता और सुरक्षा का सम्मान करना चाहिए।
फिर भी, चीन ने कोई कड़ा कदम नहीं उठाया। इसका मुख्य कारण यह है कि वह इस समय ईरान से बड़ा तेल और ऊर्जा का व्यापार करता है। ईरान तेल का बड़ा हिस्सा चीन को भेजता है, और चीन की रिफाइनरी कंपनियाँ ईरानी तेल पर काफी निर्भर हैं। लेकिन इस बार युद्ध के कारण उस तेल सप्लाई में खतरा पैदा हो गया है इसलिए कई चीनी कंपनियों ने ईरानी तेल की ख़रीद खुद-ब-खुद कम कर दी है। चीन अपने बाहरी नीतियों में संतुलन बनाए रखना चाहता है। वह अमेरिका, सऊदी अरब और रूस जैसे देशों के साथ भी अच्छे रिश्ते रखना चाहता है, जिससे उसके आर्थिक हित सुरक्षित रहें। अगर चीन ने ईरान की पूरी तरह मदद की या युद्ध में शामिल हो गया, तो इससे चीन के लिए बड़े आर्थिक और राजनयिक जोखिम खड़े हो सकते हैं।

इसलिए बीजिंग ने अभी तक मजबूत विरोध का ऐलान करते हुए भी कोई बड़ा प्रतिशोधी कदम नहीं उठाया। वह चुप रहने जैसा असर इसलिए नहीं है कि वह ईरान का समर्थन नहीं करता, बल्कि इसलिए क्योंकि वह युद्ध के असर से अपना खुद का आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा तंत्र बचाने की कोशिश कर रहा है। संक्षेप में, चीन ने इस समय केवल बातचीत और युद्ध समाप्ति की बात की है, पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की है क्योंकि चीन के आर्थिक हित और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर उसे सतर्क रहना पड़ रहा है।